ग्रहों की ऊर्जा, मन पर प्रभाव और जीवन में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तन
हर महीने आने वाली अमावस्या और पूर्णिमा को ज़्यादातर लोग सिर्फ तिथि मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
लेकिन ज्योतिष शास्त्र में ये दोनों दिन ऊर्जा के सबसे शक्तिशाली बिंदु माने जाते हैं।
अगर जन्म कुंडली जीवन का नक्शा है,
तो अमावस्या और पूर्णिमा उस नक्शे पर पड़ने वाली ऊर्जा की लहरें हैं —
जो मन, निर्णय और घटनाओं को गहराई से प्रभावित करती हैं।
अमावस्या और पूर्णिमा सिर्फ चंद्र तिथि नहीं हैं
ज्योतिष में चंद्रमा:
- मन
- भावना
- स्मृति
- और मानसिक स्थिरता
का कारक है।
जब चंद्रमा सूर्य के साथ या उसके विपरीत स्थिति में आता है,
तो मानसिक ऊर्जा चरम पर पहुँच जाती है।
इसी कारण:
- अमावस्या = भीतर की उथल–पुथल
- पूर्णिमा = भावनाओं का विस्फोट
देखने को मिलता है।
अमावस्या का ज्योतिषीय अर्थ क्या है?
अमावस्या वह तिथि है जब
चंद्रमा सूर्य के बहुत क़रीब होता है और दिखाई नहीं देता।
ज्योतिषीय दृष्टि से:
- मन भीतर की ओर मुड़ता है
- पुरानी स्मृतियाँ सक्रिय होती हैं
- अवचेतन मन ज़्यादा प्रभावी हो जाता है
इसीलिए अमावस्या के आसपास:
- बिना कारण बेचैनी
- अनिर्णय
- अकेलापन
- या पुराने विषयों पर सोच
बढ़ सकती है।
👉 अमावस्या का प्रभाव विशेष रूप से उन लोगों पर ज़्यादा होता है
जिनका चंद्रमा जन्म कुंडली में कमजोर या पीड़ित हो।
अमावस्या का जीवन पर वास्तविक असर
अमावस्या के समय:
- बड़े निर्णय लेने में भ्रम हो सकता है
- भावनात्मक प्रतिक्रिया तेज़ हो जाती है
- व्यक्ति पुराने कर्मों की ओर खिंचता है
इसी कारण शास्त्रों में कहा गया है कि:
“अमावस्या पर नया काम नहीं, आत्म-निरीक्षण करना चाहिए।”
यह समय:
- रुकने
- सोचने
- और भीतर झाँकने
का होता है, न कि जल्दबाज़ी का।
पूर्णिमा का ज्योतिषीय महत्व
पूर्णिमा वह तिथि है जब
चंद्रमा सूर्य के ठीक सामने होता है और पूरी तरह प्रकाशित रहता है।
ज्योतिष में यह स्थिति:
- भावनाओं को बाहर लाती है
- मन को अत्यधिक सक्रिय करती है
- और दबे हुए विषयों को सतह पर ले आती है
इसीलिए पूर्णिमा के आसपास:
- बहस
- भावनात्मक निर्णय
- अचानक प्रतिक्रिया
ज़्यादा देखने को मिलती है।
पूर्णिमा सकारात्मक भी हो सकती है — कैसे?
अगर चंद्रमा कुंडली में मजबूत हो,
तो पूर्णिमा:
- स्पष्ट सोच
- आत्मविश्वास
- और रचनात्मकता
भी दे सकती है।
इसीलिए कई साधनाएँ, ध्यान और आत्मिक अभ्यास
पूर्णिमा के दिन किए जाते हैं —
क्योंकि उस दिन चेतना अधिक ग्रहणशील होती है।
अमावस्या–पूर्णिमा और मानसिक स्वास्थ्य का संबंध
आधुनिक मनोविज्ञान भी मानता है कि
चंद्र चक्र का मानव मन पर प्रभाव पड़ता है।
ज्योतिष इसे पहले से जानता था।
कमज़ोर चंद्रमा वाले लोग:
- अमावस्या पर ज़्यादा उदास
- पूर्णिमा पर ज़्यादा भावुक
हो सकते हैं।
इसी कारण:
“हर व्यक्ति पर इन तिथियों का असर एक जैसा नहीं होता।”
क्या इन दिनों उपाय ज़रूरी होते हैं?
ज्योतिष का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं है।
लेकिन जागरूक रहना ज़रूरी है।
अमावस्या और पूर्णिमा पर:
- भारी निर्णय टालना
- संवाद में संयम रखना
- और स्वयं को observe करना
सबसे बड़ा उपाय माना जाता है।
हर व्यक्ति के लिए एक जैसे उपाय सही नहीं होते,
क्योंकि हर किसी की कुंडली अलग होती है।
व्यक्तिगत कुंडली का रोल यहाँ क्यों अहम है?
अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में:
- चंद्रमा पीड़ित हो
- राहु–केतु का प्रभाव हो
- या मन से जुड़े भाव कमजोर हों
तो अमावस्या–पूर्णिमा
उसके जीवन में अचानक उतार–चढ़ाव ला सकती है।
इसीलिए अनुभवी ज्योतिषी
इन तिथियों को जनरल डर की तरह नहीं,
बल्कि व्यक्तिगत चेतावनी और अवसर की तरह देखते हैं।
इसी संतुलित दृष्टिकोण के साथ
Acharya Dr. Sarita Mishra
चंद्रमा की स्थिति, दशा और मानसिक प्रवृत्ति को जोड़कर
यह समझाने पर ज़ोर देती हैं कि
इन दिनों व्यक्ति को क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
यह दृष्टिकोण:
- डर नहीं बढ़ाता
- बल्कि आत्म-नियंत्रण सिखाता है
- और जीवन को स्थिर बनाता है
निष्कर्ष: अमावस्या और पूर्णिमा — चेतावनी नहीं, संकेत हैं
अमावस्या और पूर्णिमा
कोई अशुभ दिन नहीं हैं।
ये दिन हमें बताते हैं:
“आज बाहरी दुनिया नहीं,
अपने भीतर ध्यान दो।”
जो व्यक्ति:
- इन दिनों खुद को समझता है
- भावनाओं को observe करता है
- और निर्णयों में संयम रखता है
उसके लिए ये तिथियाँ
कमज़ोरी नहीं, जागरूकता का साधन बन जाती हैं।