ग्रह संकेत, मानसिक स्थिति और सही समय की पहचान
दूसरी शादी या पुनः विवाह का विषय बहुत संवेदनशील माना जाता है।
कई लोग इस पर बात करने से भी डरते हैं, क्योंकि समाज इसे असफलता से जोड़ देता है।
लेकिन ज्योतिष शास्त्र इस विषय को दोष नहीं, परिस्थिति और कर्म के रूप में देखता है।
अक्सर लोग पूछते हैं:
“क्या मेरी कुंडली में दूसरी शादी का योग है?”
या
“क्या मेरा टूटा हुआ वैवाहिक जीवन फिर से स्थिर हो सकता है?”
इन सवालों के उत्तर डर में नहीं,
संतुलित और गहन विश्लेषण में छुपे होते हैं।
दूसरी शादी का अर्थ क्या केवल तलाक के बाद विवाह है?
नहीं।
ज्योतिष में दूसरी शादी या पुनः विवाह का अर्थ केवल कानूनी तलाक के बाद विवाह नहीं होता।
इसमें शामिल हो सकता है:
- तलाक के बाद दूसरा विवाह
- विधवा/विधुर व्यक्ति का पुनः विवाह
- लंबे समय से अलग रह रहे जीवनसाथी के बाद नया संबंध
- या मानसिक रूप से समाप्त हो चुके रिश्ते के बाद नया दांपत्य जीवन
ज्योतिष कानूनी स्थिति से अधिक मानसिक और कर्म स्थिति को देखता है।
कुंडली में दूसरी शादी के योग कैसे बनते हैं?
दूसरी शादी का योग कभी भी एक ग्रह या एक भाव से तय नहीं होता।
इसके लिए कई स्तरों पर संकेत देखे जाते हैं।
🔹 सातवाँ भाव (पहला विवाह)
सातवाँ भाव विवाह और जीवनसाथी का प्रतिनिधित्व करता है।
अगर:
- सातवाँ भाव अत्यधिक पीड़ित हो
- उसका स्वामी कमजोर हो
- या बार-बार पाप ग्रहों से ग्रसित हो
तो पहला विवाह:
- संघर्षपूर्ण
- असंतुलित
- या टूटने की ओर बढ़ सकता है
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन में विवाह सुख समाप्त हो गया।
🔹 दूसरा और ग्यारहवाँ भाव (नया जीवन)
दूसरी शादी के संकेत अक्सर:
- दूसरे भाव (नया परिवार)
- और ग्यारहवें भाव (नई शुरुआत, इच्छापूर्ति)
से जुड़े होते हैं।
जब ये भाव सक्रिय होते हैं और:
- सातवें भाव से नया संबंध बनाते हैं
तो जीवन में नया वैवाहिक अध्याय संभव होता है।
🔹 शुक्र की स्थिति (सबसे निर्णायक)
शुक्र वैवाहिक सुख और संबंधों का कारक है।
अगर शुक्र:
- पहले विवाह में पीड़ित रहा हो
- लेकिन बाद की दशा या गोचर में मजबूत हो जाए
तो व्यक्ति:
- पहले रिश्ते से सीख लेकर
- अधिक परिपक्व और स्थिर दूसरा संबंध बना सकता है
👉 यही कारण है कि कई लोग दूसरी शादी में अधिक संतुलित और संतुष्ट रहते हैं।
🔹 राहु–केतु का प्रभाव
राहु:
- अचानक बदलाव
- परंपरा से हटकर निर्णय
लाता है।
केतु:
- अलगाव
- पुराने कर्मों का समापन
अगर राहु–केतु:
- सातवें भाव
- या शुक्र से जुड़े हों
तो व्यक्ति जीवन में
एक से अधिक संबंध अनुभव कर सकता है।
दशा–महादशा: सबसे बड़ा निर्णायक तत्व
कई कुंडलियों में योग होते हैं,
लेकिन जीवन में वे तभी घटित होते हैं जब दशा सक्रिय होती है।
अक्सर देखा जाता है:
- पहले विवाह में शुक्र कमजोर दशा में होता है
- दूसरे विवाह के समय वही शुक्र शुभ दशा में आता है
यही कारण है कि:
“योग होते हुए भी समय न आए तो घटना नहीं होती।”
2026 में पुनः विवाह के लिए क्या संकेत हैं?
2026 में:
- गुरु कई कुंडलियों में नए संबंध को वैधता देने का कार्य करेगा
- शनि यह सुनिश्चित करेगा कि
रिश्ता केवल भावना पर नहीं, जिम्मेदारी पर आधारित हो
इस वर्ष:
- जल्दबाज़ी से किया गया दूसरा विवाह भी तनाव ला सकता है
- लेकिन सोच-समझकर किया गया निर्णय जीवन को स्थिर बना सकता है
2026 विशेष रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है:
- जो लंबे समय से अकेले हैं
- जिनका पहला विवाह मानसिक रूप से समाप्त हो चुका है
- या जो दोबारा जीवन शुरू करना चाहते हैं
सबसे बड़ा भ्रम: “दूसरी शादी मतलब दोष”
यह सोच पूरी तरह गलत है।
ज्योतिष कहता है:
“दूसरी शादी दोष नहीं,
अधूरे कर्म का नया समाधान हो सकती है।”
हर व्यक्ति:
- पहली बार सही निर्णय लेने की मानसिक अवस्था में नहीं होता
- समय के साथ परिपक्व होता है
- और जीवन को अलग दृष्टि से देखने लगता है
अनुभवी मार्गदर्शन यहाँ क्यों ज़रूरी है?
दूसरी शादी से जुड़े मामलों में:
- डर दिखाना
- समाज का भय दिखाना
- या जल्दबाज़ी कराना
तीनों ही नुकसानदेह हैं।
इसी संतुलित दृष्टिकोण से
Acharya Dr. Sarita Mishra
कुंडली के सभी पहलुओं —
भाव, ग्रह, दशा और मानसिक स्थिति —
को जोड़कर यह स्पष्ट करती हैं कि
पुनः विवाह जीवन के लिए उपचार है या नहीं।
यह मार्गदर्शन व्यक्ति को:
- अपराधबोध से बाहर निकालता है
- सही समय की समझ देता है
- और आत्मविश्वास लौटाता है
निष्कर्ष: जीवन रुकता नहीं, बदलता है
पहला रिश्ता अगर टूट गया,
तो इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन समाप्त हो गया।
ज्योतिष शास्त्र यह सिखाता है कि:
“हर अंत, अगली शुरुआत की तैयारी होता है।”
अगर निर्णय:
- सही समय पर
- सही समझ के साथ
- और सही मार्गदर्शन में लिया जाए
तो दूसरी शादी
जीवन की सबसे संतुलित शुरुआत भी बन सकती है।