कैसे यही आपके अच्छे–बुरे समय की असली वजह होती है
बहुत बार लोग कहते हैं —
“मेरे साथ पहले सब ठीक चल रहा था, अब अचानक सब बिगड़ गया”
“पहले संघर्ष था, अब अचानक तरक्की होने लगी”
ज्योतिष शास्त्र में इन बदलावों का कारण दशा और महादशा को माना जाता है।
अगर जन्म कुंडली जीवन का नक्शा है, तो दशा-महादशा उस नक्शे पर चल रही घड़ी है।
दशा और महादशा का वास्तविक अर्थ
हर व्यक्ति की कुंडली में सभी ग्रह मौजूद होते हैं, लेकिन हर ग्रह हर समय सक्रिय नहीं रहता।
जब कोई ग्रह अपना समय (दशा) शुरू करता है, तभी उसका प्रभाव जीवन में स्पष्ट दिखाई देता है।
इसे ऐसे समझो:
एक घर में सभी सदस्य रहते हैं, लेकिन जो बोल रहा है — वही सुना जाता है।
दशा में वही ग्रह “बोलता” है।
महादशा क्या होती है?
महादशा किसी ग्रह का मुख्य कार्यकाल होती है।
हर ग्रह की महादशा अलग-अलग वर्षों की होती है:
- सूर्य – 6 वर्ष
- चंद्र – 10 वर्ष
- मंगल – 7 वर्ष
- राहु – 18 वर्ष
- गुरु – 16 वर्ष
- शनि – 19 वर्ष
(अन्य ग्रहों की भी निश्चित अवधि होती है)
इन वर्षों में वही ग्रह जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित करता है —
चाहे वह करियर हो, विवाह, धन, स्वास्थ्य या मानसिक स्थिति।
अंतरदशा और प्रत्यंतर दशा क्यों ज़रूरी है?
अक्सर लोग कहते हैं —
“मेरी तो शनि की महादशा चल रही है, इसलिए सब खराब है”
यह आधी जानकारी है।
महादशा के अंदर:
- अंतरदशा
- प्रत्यंतर दशा
भी चलती है, जो परिणाम को पूरी तरह बदल सकती है।
👉 कई बार शनि महादशा में भी:
- प्रमोशन मिलता है
- घर बनता है
- स्थिरता आती है
अगर शनि सही भाव में और शुभ ग्रहों के साथ हो।
अच्छा ग्रह भी बुरा समय क्यों देता है?
यह सबसे ज़रूरी समझने वाली बात है।
मान लो आपकी कुंडली में गुरु (बृहस्पति) है — जिसे शुभ माना जाता है।
लेकिन अगर:
- गुरु कमजोर हो
- गलत भाव में बैठा हो
- या पाप ग्रहों से पीड़ित हो
तो उसकी दशा में:
- गलत निर्णय
- आर्थिक नुकसान
- रिश्तों में भ्रम
भी आ सकता है।
इसलिए ग्रह का नाम नहीं, उसकी स्थिति मायने रखती है।
दशा कैसे जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों को प्रभावित करती है?
🔹 करियर पर प्रभाव
दसवां भाव, छठा भाव और दूसरा भाव — ये करियर से जुड़े होते हैं।
अगर इन भावों के स्वामी की दशा चल रही है, तो:
- जॉब बदलना
- प्रमोशन
- बिज़नेस ग्रोथ
- या करियर ब्रेक
सब संभव है।
🔹 विवाह और रिश्ते
सातवें भाव, शुक्र और चंद्रमा की दशा रिश्तों में बड़ा रोल निभाती है।
गलत समय पर विवाह करने से जीवन में संघर्ष बढ़ सकता है।
🔹 धन और स्थिरता
दूसरा और ग्यारहवां भाव धन से जुड़े होते हैं।
इन भावों के ग्रहों की दशा में:
- अचानक लाभ
- या अचानक खर्च
दोनों हो सकते हैं।
उपाय दशा के अनुसार ही क्यों करने चाहिए?
बहुत लोग बिना दशा देखे:
- रत्न पहन लेते हैं
- मंत्र शुरू कर देते हैं
यह खतरनाक हो सकता है।
👉 सही उपाय वही होता है:
- जो चल रही दशा के अनुकूल हो
- और कुंडली के अनुसार हो
यही कारण है कि व्यक्तिगत परामर्श ज़रूरी होता है।
अनुभवी ज्योतिषी का रोल यहाँ सबसे अहम है
दशा-महादशा पढ़ना सिर्फ गणना नहीं है —
यह अनुभव, शास्त्रीय ज्ञान और व्यावहारिक समझ का काम है।
एक अनुभवी ज्योतिषी:
- डर नहीं दिखाता
- समस्या का मूल कारण बताता है
- और सरल, व्यावहारिक उपाय देता है
यही दृष्टिकोण व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाता है।
निष्कर्ष: समय बदलता है, ग्रह नहीं
हर बुरा समय स्थायी नहीं होता।
और हर अच्छा समय हमेशा नहीं रहता।
दशा-महादशा हमें सिखाती है कि कब रुकना है, कब आगे बढ़ना है।
जो व्यक्ति अपने समय को समझ लेता है, वही सही निर्णय लेता है।